लक्ष्मी धन की देवी कहलाती है , मान्यता ये भी है कि जहाँ सफई होती है वहाँ लक्ष्मी का वास होता है। और जहाँ सफई नहीं वहाँ वही लक्ष्मी दरिद्रता का रूप धारण कर लेतीं है। पूरे साल सफई हो न हो लेकिन दीपावली में घर की स्वक्षता और सजावट का पूरा ध्यान रहता है। लक्ष्मी जी को प्रसन करने में कमी नहीं रहती। पुरे घर के कोने कोने से लेकर हर तरफ की सफई हो जाती है। लेकिन क्या अपने ध्यान दिया की घर तो साफ़ हो गया उस सड़क क्या जहाँ हम अपने घर का कूड़ा बिना सोचे समझे ढाल देते है। जैसे हम दरवाजे से घर में प्रवेष लेते है उसी प्रकार भगवान भी उसी सड़क उसी दरवाजे से आते है जहाँ कूड़े का ढेर देख कर लक्ष्मी उलटे पैर वापस हो जाती है। हम अपनी सोच में परिवर्तन क्यों नहीं लाते अगर दस झाड़ू घर के लिए तो एक बहार के लिए क्यों नहीं ?
घर की सफाई हम अपनी ख़ुशी से करते है तो क्या सड़क हमारी नहीं , कॉलोनी हमारी नहीं , ये शहर हमारा नहीं या ये देश हमारा नहीं ! बस देरी है अपने सोच पर , अपने दिमाग पर एक झाड़ू मारने की। जब हमारी सोच में स्वक्षता आएगी तब हमारे समाज में हमरे देश में स्वक्षता का एक फूल खिलेगा और वो फूल पूरी दुनिया को अपनी महक से सुगन्धित कर देगा।
लेकिन कभी कभी मायूसी तब छा जाती है जब हमारे पढ़े लिखे समाज में कुछ ऐसे भी है जो झाड़ू पर नहीं सफाई पर नहीं गन्दगी फैलाने पर विश्वास रखते है।
'सोच को बदलो , सितारे अपने आप बदल जायेंगे ,
खुद एक गन्दगी है भारत में , इसको साफ़ करने के लिए भी कोई झाड़ू उठाओ ,
एक हाँथ उठेगा ,लाखो को बुलाएगा
और तब जाके कहलायेगा स्वक्ष देश हमारा भारत'
बड़े बड़े लोग जब झाड़ू उठाते है तो न्यूज़ बन जाती है और अगर एक सफाई कर्मचारी अपना पूरा समय उस झाड़ू के साथ व्यतीत करता है तो उसके बारे में कितने पत्रकार है जो उस सफाई कर्मचारी को अपने न्यूज़ का हिसा बनाता है। दिखावये से ज्यादा जरुरी है की हम कुछ करे ऐसा जो देश के हित में हो , देश वाषियों के हित में हो। झाड़ू एक सोच है जो देश में फैली गन्दगी ख़त्म करेगा। भ्रस्टाचारी , भूसखोर नेता और कर्मचारी जो देश में समाज में गन्दगी फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ते उनकी इसी सोच को बदलने के लिए देश वाशियों ने अपने हाँथ में झाड़ू उठा लिया है हमारे देश से गन्दगी तो मिटेगी ही यहाँ तक की उम्मीद है की भ्रस्टाचारियों की सोच पर भी झाड़ू लगेगा। झाड़ू सिर्फ बहार की सफाई के लिए ही नहीं मंन की सफाई का प्रतीक है।
'एक छोटी सी चीज़ है ये झाड़ू , लेकिन काम करोड़ों के करती है
पुरे समाज की सोच को बदलने का काम करती है ये झाड़ू '
गांधी जी ने कहा था स्वतंत्रता से ज्यादा महत्वपूर्ण है स्वक्छ्ता। वे जानते थे की क्या हाल होने वाला है हमारी भारत जनता का। शहरी लोग तो अपने घर को साफ़ रखते है पर उन गाओं वालों का क्या जिनके यहाँ एक शौचालय तक नहीं है। उनके घर की महिलाओं , बच्चों और बाकी घर के सदस्यों को बहार जाना पड़ता है शौच के लिए। जिन महिलाओं का घूँघट उढ़ाना भी गवारा नहीं उनको बहार शौच के लिए जाना पड़ता है। 21 वीं सदी में है हम लेकिन सोच अभी भी वही दखियानुषी है। अगर शौच के लिए आदमी एक से दो बार जाता है तो उसे बिना नहाये धोये घर में प्रवेश नहीं करना है। यही कारण है की लोग गाओं में शौचालय नहीं बनवाते अगर बनवाते भी है तो घर से बहार। इसी सोच ने समाज में गन्दगी फैला रखी है। इसी सोच पर जरुरत है झाड़ू मारने की। पुरानी दखियानुषी बातों पर झाड़ू चलने की। गाओं की समस्या से लड़ने के लिए सरकार ने 'स्वक्ष भारत अभियान ' की शुरुवात की है। जिसके अन्तर्गत शौचालय निर्माण , स्वक्षता की सोच भारत में लायी गयी है। आज नाले , तालाब और नदियों को साफ़ करने का बीड़ा उड़ाया गया है। ये बीड़ा सिर्फ इसलिए ताकि आने वाली पीढ़ी स्वक्ष औए शीतल वायु में सांस ले सके। आने वाली पीढ़ी को भी इस बात की जागरूकता रहे की झाड़ू सिर्फ घर के लिए नहीं बहार और हमारी सोच को साफ़ रखने के लिए भी जरुरी है। जब जागरूकता आएगी तभी बदलाओ दिखेगा।



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