Wednesday, 29 April 2015

लाल था तू मेरा

लाल था वो मेरा बचा न सके 
किस्मत की अंधी से छुपा न सके 
महंगाई की केहर से बचा न सके 
लाल था वो हमारा बचा न सके 

छुपाना था उसे माँ की आँचल में 
पर अंचल को मौसम की चपटे ने फाड़ डाला 
तिनका तिनका करके संजोया था जिसे 
पूरी मेहनत और कमाई से बोया था जिसे 
लाल था वो हमारा दुनिया की नज़रों से छुपा  न सके 

धरती माँ की गोद में सोचा था सुरक्षित होगा 
माँ का प्यार उसे हर दुःख से बचाएगा 
खुशियों का संसार होगा माँ की गोद में 
पर ऐसा क्या हुआ धरती माँ ने भी छोड़ दिया साथ हमारा 
  लाल था वो माँ का क्यों माँ न बचा सकी ?

हर दुःख को भगवान का प्रशाद समज स्वागत किया 
हर कठनाइयों से बचा कर बड़ा किया 
अब समय था उसकी लहराती हांथो को पकड़ने का 
उसकी  चमकती हुई  आँखों  में अपने मेहनत  को देखने का 
उसके खिले हुए चेहरों में खुद को पहचानने का 
हर चुनौती सामना कर 
हर धुप छाओं  से बचा कर लाया जिसे 
क्या पता था आज मैं उस लाल को बचा ना सकुंगी 
लाल था वो मेरा

काश मैं ये देखने से पहले खुद खो जाता 
या समय को वापस वहीँ ले जाता 
तुझे बचाता या खुद मिट जाता
उस बेटे से न थी उमीद जो हमारा लाल है 
उस बेटे से थी उमीद जिसे मैंने धरती माँ के गोद मे बोया था
तुझे बचा न सका मेरे लाल 
लाल था तू मेरा

खुद को कोसूं या उस भगवान को 
जिम्मेदारी मेरी थी
लाल तू मेरा था न की भगवान का...

No comments:

Post a Comment