Wednesday, 29 April 2015

यादों की परछाइयाँ

बहुत सुना था माँ से
छोटी थी तो ऐसी थी
बहुत शरारत किया करती थी
खुशियों में चार चाँद लग गए
जब सुना हमारी शरारत में एक और शरारती था

अगर तुम न होते
तो ये शरारते अधूरी थी
हमारे किस्से अधूरे थे
हमरा प्यार अधूरा था

अगर तुम न होते
उस एहसास से हम मेहरूम होते
एक साया बन के साथ रहे
वो पल मेरे जीवन का एहसास बन गए
मेरी खुशियों की पहचान बन गए

अगर तुम न होते
तो कौन दोस्त बन के हाँथ थमता
कौन भाई बन के डाँटता
गिरी जब मैं किसी राह पे
आंसू आये तुम्हारे आँख से
और वो आंसू मेरी खुशियों को मोती दे गए

अगर तुम न होते
तो कौन मेरी छोटी छोटी खुशियों में खिलखिलाता
कौन हकीकत में रुलाता और ख़्वाबों में हँसता
वो बचपन के पल बाते बन गयी
आज वही बातें यादें बन गयी


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